Author: Mukesh Kumar Singh

ग़रीब सवर्णों को आरक्षण: इस लॉलीपॉप से भी मोदी सरकार का भला नहीं होगा

ताज़ा विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी को लेकर सवर्ण हिन्दुओं में ये धारणा फैलने लगी कि मोदी सरकार के जाने का वक़्त आ गया और इसने न तो राम मन्दिर को लेकर अपना वादा निभाया और ना ही आरक्षण को लेकर। सवर्णों के ऐसे आक्रोश को देखते हुए ही बीजेपी के पैरों तले ज़मीन खिसकने लगी है। पार्टी को इसका भरपूर आभास भी हो रहा है। इसीलिए ‘ग़रीब सवर्णों को आरक्षण’ के ज़रिये मोदी सरकार ने तुरुप का पत्ता फेंका है! सरकार ने अब भागते भूत की लंगोटी के रूप में सवर्ण आरक्षण के लॉलीपॉप को आज़माने की जुगत निकाली है।

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तीन तलाक़: अब क़ानून बनाने के लिए पर्याप्त वक़्त नहीं बचा

क्या आप जानते हैं कि दुनिया के हर देश में तलाक़ का विधान है, लेकिन तलाक़ को लेकर सज़ा का क़ानून कहीं नहीं है! यही वो सबसे बड़ी वजह है जो जिसकी बेड़ियाँ मोदी सरकार अपने मौजूदा कार्यकाल में नहीं खोल पाएगी। तीन तलाक़ अब भी ग़ैर-क़ानूनी है। इरादा इसे आपराधिक हरक़त बनाने का है। इसके विधेयक ने तमाम विरोध के बावजूद लोकसभा की बाधा भले ही पार कर ली, लेकिन राज्यसभा अब भी टेढ़ी खीर ही है। ये बाधा इसीलिए भी और कठिन हो जाती है कि राज्यसभा में तो मोदी सरकार के पास कभी बहुमत रहा नहीं,...

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चुनाव को सामने देख उत्तर प्रदेश में सुलग चुकी है ध्रुवीकरण की भट्ठी

भारत 17वें आम चुनाव की दहलीज़ पर आ पहुँचा है। देश भर में इसकी तैयारियाँ करवट ले रही है। लेकिन उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव की तैयारियाँ ज़ोरों पर हैं। क्योंकि 2019 में निर्णायक जनादेश इसी राज्य से उभरेगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश में जहाँ राम मन्दिर को लेकर माहौल को गरमाने की ज़बरदस्त कोशिश चल रही है, वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक उन्माद बहुत तेज़ी से अपने पंख पसार रहा है। सिर्फ़ दिसम्बर में ही अब तक कम से कम आठ ऐसी घटनाएँ सामने आ चुकी हैं, जिनका मक़सद धार्मिक ध्रुवीकरण और उन्मादी माहौल को हवा देना है।...

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नीतीश-पासवान ही क्या, बीजेपी तो अब सभी सहयोगियों की शर्तें मानेगी!

सियासत पर पैनी नज़र रखने वालों का ताज़ा ‘राग-दरबारी’ है कि ‘बिहार में 22 सीटें जीत चुकी बीजेपी अबकी बार 17 सीटों पर क्यों राज़ी हो गयी?’ तमाम सतही नज़रियों में से एक है, ‘कम लड़ेंगे तो कम हारेंगे!’ ये हँसी-मज़ाक की बात है। असलियत कुछ और है। बीजेपी समझ चुकी है कि उसके लिए अब ‘सत्ता की हवस’ के शान्त होने का दौर आ चुका है। अब उसे ‘सहयोगियों की भूख’ सता रही है! उसे अपनी पालकी ढोने वाले कहारों की लालसा है। नये कहार मिल नहीं रहे। इसीलिए संघ नहीं चाहता कि बचे-खुचे कहार भी हाथ से...

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भगवा ख़ानदान ने हनुमान जी का हाल ‘ग़रीब की लुगाई’ जैसा बना दिया!

वो 27 नवम्बर 2018 का मनहूस दिन था, जब हिन्दू वोटरों को साम्प्रदायिक आधार पर लामबन्द करने के लिए अलवर पधारे अजय सिंह बिष्ट ने हनुमान जी की विशेषता से सबको अवगत करवाया। इसके बाद तो भगवा ख़ानदान में निठल्लों के बीच हनुमान पर शोध करने की होड़ मच गयी।

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