Author: Mukesh Kumar Singh

क्यों काँवड़िए लोगों की दुआएँ और आशीर्वाद के बजाय श्राप बटोरते हैं?

भारत में धार्मिक आस्था को बहुत संवेदनशील विषय माना जाता है। चाहे बात किसी भी धर्म या उपासना पद्धति की हो। समझदार और बुद्धिजीवी किस्म के लोग धार्मिक आस्थाओं से जुड़ी पेंचीदगियों पर चर्चा करने से इसलिए कतराते हैं कि उन्हें लगता है कि हमारा जनमानस तथ्यों को समझने की मनोदशा में ही नहीं है। लेकिन मेरा मानना है कि प्रयास जारी रखना चाहिए। इसलिए हमें काँवड़ियों से जुड़े समाज शास्त्र और अर्थशास्त्र को भी जानना चाहिए। देश में सावन का महीना अपनी निराली रंगत लेकर आता है। बारिश का मौसम धरती की खुशबू में कहीं सोंधापन तो कही...

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फाँसी पर टाँगने का रिकॉर्ड बनाने का सुनहरा मौक़ा

ज़रा सोचिए कि ऊधमपुर में ज़िन्दा पकड़े गये पाकिस्तानी आतंकी नावेद उर्फ क़ासिम से भारत सरकार क्या-क्या सबक़ ले सकती है? क्योंकि ये तो तय है कि क़ानूनी प्रक्रिया को पूरी करके उसे सूली पर ही लटकाना होगा। उसका ग़ुनाह ही ऐसा है। याद रखें तो दो तरह का सबक़ हमें अज़मल कसाब से ज़रूर मिला है। पहला, हमें अबकी बार नावेद को लेकर पाकिस्तान के साथ कैसे पेश आना चाहिए? दूसरा, अज़मल कसाब के ज़िन्दा पकड़े जाने की वजह से भारत सरकार पर जो वित्तीय बोझ पड़ा था, उसे इस बार कैसे कम से कम रखा जाए? दोनों...

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काश, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी तिलमिलाते इन ख़बरों से…!

दो ख़बरें पढ़कर मन तिलमिला गया। काश! इन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी पढ़ा हो! उनका भी मन तिलमिलाया हो! पहली ख़बर उनके दो कैबिनेट मंत्रियों से सम्बद्ध है और दूसरी, 26 साल पहले हुए कुख़्यात भागलपुर के दंगों से। दोनों हमारी पूरी शासन व्यवस्था की रीतियों-नीतियों पर अट्टहास करती हैं! एक में भाई-भतीजावाद की बदबू है तो दूसरे में, पूरे तंत्र की सड़ांध! क़ानून मंत्री सदानन्द गौड़ा अपना सारा काम छोड़कर या ‘निपटाकर’ इस बात के लिए बेचैन हैं कि कैसे उनकी सहयोगी मंत्री मेनका गाँधी की वो क़िताब क़ानून के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बने जिसमें...

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अरूण जेटली के घड़ियाली आँसू…!

मौजूदा वित्तमंत्री अरुण जेटली की रैंकिंग आर्थिक और वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ के रूप में क्या होगी! ये कहना तो मुश्किल है। ये तय करना भी मुश्किल है कि वो कितने बड़े जन-नेता हैं! क्योंकि बेचारे कभी लोकसभा का चुनाव नहीं जीत पाये। बेचारे, इसलिए क्योंकि 2014 वाली मोदी की आँधी में भी वो अमृतसर में अमरिन्दर सिंह के आगे लड़खड़ा गये। हालाँकि, 2000 से वो राज्यसभा में हैं। प्रखर वक़्ता, चिन्तक, विचारक और उम्दा संगठक हैं। बीजेपी में मौजूद नगीनाओं में वो हमेशा अगली क़तार में खड़े रहे हैं। मोदी की सरकार में भी और वाजपेयी के दौर...

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कुत्ते की दुम है पाकिस्तान…!

हिन्दुस्तानी ज़ुबान की इस क़हावत को पाकिस्तानी आवाम भी खूब समझती है। जैसे कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती, वैसे ही पाकिस्तान की खोपड़ी भी काबू में नहीं आ रही। वर्ना, हमने सब कुछ करके तो देख लिया। जंग में ठोका, अंग-भंग किया, मारा-पीटा, पुचकारा-समझाया। रिश्ते-नाते तोड़ लिये। क्रिकेट बन्द करके देख लिया। कारगिल में भी नशा उतारकर देख लिया। लेकिन पाकिस्तान है कि अपनी फ़ितरत से बाज़ ही नहीं आता। उस बदजात का आख़िर करें तो करें क्या? फ़र्ज़ कीजिए, एक बार फिर से घर में घुसकर ठोंकने का क़दम उठाया जाए, आतंकवादी ट्रेनिंग कैम्प पर हमला...

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