Author: Mukesh Kumar Singh

फाँसी पर हाय-तौबा क्यों, एक भी शख़्स तो ऐसा नहीं जिसे इंसाफ़ मिलता हो!

सूली पर किसी को लटकाने की नौबत आते ही बुद्धिजीवियों का एक तबक़ा जुगाली करने लगता है। मानवाधिकार, सभ्य समाज, सरकारी बर्बरता, निरर्थक सज़ा जैसी कितनी ही कसौटियों को लेकर हॉय-तौबा मचायी जाती है। बीते तीन दशकों में इस प्रवृत्ति ने खूब ज़ोर मारा है। प्रतिपक्ष की दलीलें है कि यदि सब कुछ विधि-विधान के मुताबिक़ है तो फिर रंज कैसा! अपराध की सज़ा को लेकर सियासत क्यों? फाँसी के पक्ष और विपक्ष की सभी दलीलों में थोड़ी-बहुत जान तो है। किसी का नज़रिया खोखला नहीं है। लेकिन जब बात किसी व्यवस्था पर अँगुली उठाने की होगी तब अँगुली...

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बीजेपी, नटवर-थरूर की कुर्सी छीनने को कैसे भूल गयी?

संसद ठप है। ये तब तक ठप ही रहेगी, जब तक कि कम से कम सुषमा स्वराज का इस्तीफ़ा नहीं हो जाता। काँग्रेस की अगुवाई में विपक्ष उसी तर्ज़ पर संसद को सिर पर उठाये हुए है, जिस तरह से बोल्कर रिपोर्ट को लेकर नटवर सिंह को जाना पड़ा था। या, जिस तरह से आईपीएल की काली छाया ने शशि थरूर से मंत्री पद छीन लिया था। ये बातें बहुत पुरानी नहीं हैं। सुषमा, नटवर और थरूर – सभी का मामला सीधे-सीधे रिश्वतख़ोरी का नहीं है। बल्कि तीनों में इस बात की समानता है कि इन नेताओं ने अपने...

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