Author: Mukesh Kumar Singh

क्या फ़ीकी पड़ रही है नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता?

क्या नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता फ़ीकी पड़ रही है? ज़रा सोचिए कि अगर कोई आपसे ये सवाल पूछ बैठे तो आपका जबाव क्या होगा! आपके जबाव तीन तरह के हो सकते हैं – पहला, ‘बिल्कुल नहीं। ये क्या सवाल हुआ? अभी तो उन्हें आये सवा साल ही हुआ है। इस दौरान वो कांग्रेस की गन्दगी ही साफ़ करने में लगे रहे। आप उन्हें पूरा वक़्त दीजिए। वो अपने हरेक वादे पर न सिर्फ़ ख़रे उतरेंगे, बल्कि अपेक्षाओं से भी बेहतर साबित होंगे।’ दूसरा सम्भावित जबाव हो सकता है – ‘कहना मुश्किल है कि लोकप्रियता घट रही है या नहीं।...

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सियासी हम्माम में 24 कैरेट का कौन है?

25 सांसदों के लोकसभा से निलम्बन को लेकर काँग्रेस का हॉयतौबा मचाना लाज़िमी है। अब अगर कोई उसे ये कहे कि आपातकाल की नीति अपनाने वालों को बाक़ी किसी दमन के बारे में मुँह खोलने का कोई हक़ नहीं है, तो क्या ये बात वो हज़म कर लेंगे! संसद या विधानसभाओं में उदण्ड सदस्यों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होने का ये पहला या आख़िरी मामला नहीं है। तमाम मिसालें क़ायम होती रही हैं। आगे भी होंगी। होती भी रहनी चाहिए। लेकिन ये प्रवृत्ति संसदीय लोकतंत्र को कमज़ोर बनाती है। ‘उसकी कमीज़ भला मेरी कमीज़ से सफ़ेद कैसे!’ या ‘उसका बेज़ा...

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फाँसी पर हाय-तौबा क्यों, एक भी शख़्स तो ऐसा नहीं जिसे इंसाफ़ मिलता हो!

सूली पर किसी को लटकाने की नौबत आते ही बुद्धिजीवियों का एक तबक़ा जुगाली करने लगता है। मानवाधिकार, सभ्य समाज, सरकारी बर्बरता, निरर्थक सज़ा जैसी कितनी ही कसौटियों को लेकर हॉय-तौबा मचायी जाती है। बीते तीन दशकों में इस प्रवृत्ति ने खूब ज़ोर मारा है। प्रतिपक्ष की दलीलें है कि यदि सब कुछ विधि-विधान के मुताबिक़ है तो फिर रंज कैसा! अपराध की सज़ा को लेकर सियासत क्यों? फाँसी के पक्ष और विपक्ष की सभी दलीलों में थोड़ी-बहुत जान तो है। किसी का नज़रिया खोखला नहीं है। लेकिन जब बात किसी व्यवस्था पर अँगुली उठाने की होगी तब अँगुली...

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बीजेपी, नटवर-थरूर की कुर्सी छीनने को कैसे भूल गयी?

संसद ठप है। ये तब तक ठप ही रहेगी, जब तक कि कम से कम सुषमा स्वराज का इस्तीफ़ा नहीं हो जाता। काँग्रेस की अगुवाई में विपक्ष उसी तर्ज़ पर संसद को सिर पर उठाये हुए है, जिस तरह से बोल्कर रिपोर्ट को लेकर नटवर सिंह को जाना पड़ा था। या, जिस तरह से आईपीएल की काली छाया ने शशि थरूर से मंत्री पद छीन लिया था। ये बातें बहुत पुरानी नहीं हैं। सुषमा, नटवर और थरूर – सभी का मामला सीधे-सीधे रिश्वतख़ोरी का नहीं है। बल्कि तीनों में इस बात की समानता है कि इन नेताओं ने अपने...

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