Category: FINANCIAL

जनाब झूठली साहब और नोटबन्दी का पंचनामा!

ज़रा समझिए कि जिन 17.42 लाख मगरमच्छों और घड़ियालों को पकड़ने के लिए नोटबन्दी के ज़रिये, जिस नदी या सागर को ही सुखाने का फ़ैसला लिया गया, उसमें 130 करोड़ भारतीय नागरिक या जीव-जन्तु पल रहे थे। ग़लत नीति की वजह से मगरमच्छ तो पानी से निकलकर तटों पर जा छिपे, लेकिन 129.82 करोड़ भारतवासियों का जीना मुहाल हो गया। अरे, इतना बड़ा मूर्ख तो पाग़ल बादशाह मोहम्मद बिन तुग़लक़ भी नहीं था!

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सत्ता के लालची न होते तो नोटबन्दी के फ़ेल होने पर मोदी पिछले साल ही इस्तीफ़ा दे देते!

यदि नरेन्द्र मोदी ज़रा सा भी चरित्रवान होते तो नोटबन्दी पर आयी रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट के बाद एक पल भी सत्ता में नहीं रहते! वैसे तो मोदी को नोटबन्दी के विफल रहने की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए साल भर पहले यानी अगस्त 2017 में ही इस्तीफ़ा दे देना चाहिए था, क्योंकि तभी ये पता चल चुका था कि 99 फ़ीसदी नोट वापस बैंकों में पहुँच चुके हैं! लेकिन सत्ता के लालची नरेन्द्र मोदी के पास ‘नैतिक बल’ तो कभी रहा ही नहीं! तभी तो 2002 के गुजरात दंगों के बाद भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मोदी को नष्ट नहीं किया क्योंकि मोदी ने ‘संघी कट्टरवाद’ में चार चाँद जो लगाये थे!

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आख़िर क्यों मोदी सरकार पेट्रोलियम उत्पादों को कभी जीएसटी के दायरे में नहीं ला पाएगी?

न नौ मन तेल होगा ना राधा नाचेगी’ जैसा ही है! ‘अच्छे दिन’, ‘सबको 15-15 लाख’, ‘हर साल दो करोड़ रोज़गार’, ‘किसानों की आमदनी को डेढ़ गुना और फिर दोगुना’ करने वाले जुमलों का हश्र किससे छिपा है!

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जनता का तेल निकालकर नसीबवाले ने बनाया देश को बदनसीब

जनता अब विपक्ष के समझाये बग़ैर ही समझ रही है कि मोदी राज ने अपनी वित्तीय नाक़ामियों पर पर्दा डालने और बीजेपी के नेताओं तथा अपने चहेते धन्ना सेठों के काले-धन को सफ़ेद करने के लिए नोटबन्दी का शिग़ूफ़ा छोड़ा था। कोई नहीं जानता कि नोटबन्दी से देश को क्या फ़ायदा मिला? ईमानदारी से नोटबन्दी के बारे में बताने वाले लोगों के मुँह में कपड़ा ठूँस दिया गया है। दरअसल, नोटबन्दी, अपने आप में, देश का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है!

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पेट्रोलियम दाम: निर्लज्ज और संवेदनहीन सत्ता से अंगारे नहीं तो क्या फूल बरसेंगे?

मई 2014 के बाद से क्रूड का दाम क़रीब 60 फ़ीसदी गिर चुका है। लेकिन बार-बार उत्पाद कर (एक्साइज़) और वैट (मूल्य संवर्धित कर) को बढ़ाकर सरकारों ने न सिर्फ़ जनता को मिलने वाली राहत को ढकार लिया, बल्कि टैक्स को ख़ून चूसने वाली ऊँचाई पर पहुँचा दिया। अप्रैल 2015 से मार्च 2017 के बीच सरकार को पेट्रोलियम पर वसूले गये टैक्स से 1.6 खरब रुपये की अतिरिक्त कमाई हुई।

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गहनों पर GST के नये फ़ॉर्मूले से बढ़ेगा ऐसे भ्रष्टाचार और काला धन…!

समाज का सामान्य नियम है कि अफ़सरों की मिलीभगत के बग़ैर कोई चोरी नहीं हो सकती। इसके अलावा, यदि कोई व्यापारी हर तरह से नियम-क़ायदों के मुताबिक़ भी काम करे तो भी उससे घूस ऐंठने के लिए सरकारी अफ़सर उसे तरह-तरह से उलझाते हैं और अन्ततः चढ़ावा लेकर ही शान्त होते हैं। इसीलिए, तमाम सरकारी फ़ज़ीहतों से बचने के लिए व्यापारी सीधे-सीधे चढ़ावा चढ़ाना पसन्द करते हैं। भ्रष्ट अफ़सरों को भी ये ढर्रा बहुत पसन्द आता है। इसीलिए, उनकी तरह-तरह की छापेमारी भी सिर्फ़ रस्म-अदायगी होती है!

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सरासर झूठ है कि ‘नोटबन्दी से अर्थव्यवस्था को हुआ 5 लाख करोड़ रुपये का फ़ायदा’

‘ख़बर’ लिखने वाले रिपोर्टर और उसे सम्पादित तथा प्रकाशित करने वाले सम्पादक ने ख़बर में इस बात का कोई ब्यौरा नहीं दिया कि आख़िर ये तय कैसे हुआ कि नोटबन्दी से अर्थव्यवस्था को 5 लाख करोड़ रुपये का फ़ायदा हुआ है? मज़े की बात ये भी है कि भक्ति-भाव में डूबे तमाम मीडिया संस्थानों ने आव देखा न ताव और झूठ को फैलाने की भेड़-चाल में शामिल में गये! दर्जनों वेबसाइट्स ने इस ‘भ्रामक और झूठी ख़बर’ को कॉपी-पेस्ट करके अफ़वाह को फैलाने में अपना योगदान देना शुरू कर दिया!

पढ़िए पूरा विश्लेषण….

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उसे वादा निभाने की फ़िक्र क्यों हो जिसकी लफ़्फ़ाज़ियाँ ही ग़ुल ख़िलाती हों…!

यदि आपको सालाना दो करोड़ रोज़गार के अवसर पैदा करने वाला ‘प्रधान सेवक नरेन्द्र मोदी’ का कोई चुनावी वादा याद है तो कृपया उसे जुमला या मज़ाक या सियासी हवाबाज़ी समझकर भूल जाइए! क्योंकि जितना उसे याद करेंगे उतना ही पुराने ज़ख़्मों को कुरेदने जैसी नौबत पैदा होगी। लिहाज़ा, उसे एक बुरा सपना समझकर भूल जाने से कम से कम चित्त को तो शान्ति मिलेगी! इसके बाद रोज़गार सृजन की उपलब्धियों से जुड़ी निम्न रिपोर्ट को ज़रूर पढ़े और ख़ुश हों कि 30 साल के अन्तराल के बाद पूर्ण बहुमत से सत्ता में आयी दुनिया की सबसे सच्चरित्र, सबसे संस्कारित, सबसे सुयोग्य, सबसे कर्मठ, सबसे निष्ठावान, सबसे राष्ट्रवादी और सबसे ईमानदार सरकार ने भारतमाता के स्वर्ण मुकुट में कैसे दुनिया के बेशक़ीमती रत्नों और हीरे-जवाहरातों को जड़वा है। वैसे इस रिपोर्ट को पढ़कर यदि आपका मन इतना पुलकित न हो जाए कि आप अभी से ही 2019 में भी इसी यशस्वी सरकार को पुनः सत्ता में लाने का संकल्प न ले लें तो आपकी बौद्धिक सूझ-बूझ पर लानत है!

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