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जन-गण नामकरण आन्दोलन: मुसलमान मंत्री बदलें नाम, अब ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी।

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मोदी सरकार की औक़ात नहीं कि वो क़ानून बनाकर अयोध्या विवाद ख़त्म कर दे!

चुनाव को सामने देख भगवा ख़ानदान चाहता है कि मोदी सरकार अध्यादेश लाकर अयोध्या की ज़मीन हिन्दुओं को सौंप दे। इसके लिए दलीलें गढ़ी गयीं कि अब देरी बर्दाश्त नहीं हो रही या अब धैर्य जवाब दे रहा है! मोदी सरकार के क़ानून मंत्री कहते हैं कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर पूरा भरोसा है। लेकिन विपक्षी पार्टियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का इन्तज़ार ज़रूर करना चाहिए। मोदी सरकार का सबसे बड़ा धर्म संकट ये है कि इसी प्रसंग में 1993 में सुप्रीम कोर्ट ये कह चुका है कि ‘ज़मीन के झगड़ों को ख़त्म करने के लिए उसका अध्यादेश लाने या क़ानून बनाने का क़दम संवैधानिक नहीं था।’ वही दशा आज 25 साल बाद भी है।

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2019 में भी मोदी जीते तो 36 नहीं बल्कि 72 राफ़ेल मिलेंगे और वो भी बिल्कुल मुफ़्त!

क्या आप जानते हैं कि फ़्राँस से अन्ततः भारत को 36 राफ़ेल विमान बिल्कुल मुफ़्त मिलने वाले हैं!...

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विवेक की हत्या के लिए अफ़सरों और नेताओं पर भी मुक़दमा क्यों नहीं चलना चाहिए?

लखनऊ में विवेक तिवारी की हत्या की ख़बर जब से मिली, तभी से दिमाग़ में कई सवाल दिमाग़ में कौंध रहे...

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‘लोकतंत्र का सेफ़्टी वाल्व’ तो बहाना है, मक़सद ‘भागते भूत की लंगोटी’ पाना है!

यदि गहराई से देखा जाए तो संघ भी नक्सली संगठन ही है! इसने भी संविधान को हमेशा ठेंगे पर ही रखा! दोनों में बुनियादी फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि मायोवादियों का दबादबा जहाँ आदिवासियों और दूरदराज के इलाके में बसे ग़रीबों के बीच है, वहीं संघियों ने मुख्यधारा में शामिल होकर सवर्णों और अगड़ी जातियों के सम्पन्न लोगों में अपनी पैठ बनायी। लेकिन नक्सली हों या संघी, दोनों ने ही हिंसा को अपने वजूद का हथियार बनाया। संघियों ने जहाँ अवार्ड वापसी गैंग, अफ़ज़ल प्रेमी गैंग, अर्बन नक्सल गैंग, हमें चाहिए आज़ादी गैंग को राष्ट्रविरोधी करार दिया, वहीं अपनी लिंचिंग, दंगों, उन्मादी हत्याओं, जातीय दमन और उत्पीड़न को राष्ट्रप्रेम और देशसेवा का तरह पेश किया।

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मोदी राज ने पेट्रोल-डीज़ल को सरकारी अय्याशी का ज़रिया बना डाला!

सभी धर्मों की आध्यात्मिक कथाएँ हमें बताती हैं कि असुरों, राक्षसों और दानवों ने हमेशा देवताओं से शक्ति प्राप्त की और उस शक्ति से देवताओं को ही सताया। बिल्कुल यही हाल नरेन्द्र मोदी का है। उन्होंने लोकतंत्र के देवताओं यानी जनता से सरकार चलाने के लिए जो शक्तियाँ प्राप्त कीं, उसके लिए दलीलें दी कि वो प्रधान सेवक बनकर सेवा करेंगे, अच्छे दिन लाएँगे, चोरों-बेईमानों से सुरक्षा देने के लिए चौकीदारी या पहरेदारी करेंगे। लेकिन किया क्या? जमकर जुमलेबाज़ी की, भरपूर झूठ बोला, जनता पर टैक्स का बोझ लादकर उसका जीना हराम किया, नोटबन्दी और घटिया जीएसटी को ज़बरन थोपकर उन्हीं लोगों के लिए रोज़ी-रोटी का संकट पैदा कर दिया जिनसे उन्हें सारी ताक़तें मिली थीं।

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मोदी युग की इकलौती उपलब्धि: ‘आव देखो ना ताव, बस फेंकते रहो!’

मोदी ‘रोग मुक्त भारत’ पर ही नहीं थमे, क्योंकि उन पर तूफ़ानी रफ़्तार से बस ‘फेंकते रहो’ का भूत सवार है! तभी तो उन्होंने लाल क़िले से कहा था कि ‘सौ साल भी कम पड़ जाते, अगर 2013 की रफ़्तार से चले होते तो!’ लिहाज़ा, मोदी ने जूनागढ़ में हुँकार भर दी कि ‘वो हर ज़िले में एक मेडिकल कॉलेज और अस्पताल खोलने वाले हैं!’ कब? ये जानना मना है! मोदी सरकार का कोई मंत्री, संघ-बीजेपी का कोई नेता ऐसा नहीं, जो अपने-अपने दायरे में ‘फेंकते रहो’ का खेल ना खेल रहा हो! तभी तो कोई कहता है कि केरल में बाढ़ के लिए बीफ़ का सेवन ज़िम्मेदार है तो कोई बताता है कि सबरीमाला मन्दिर में महिलाओं को जाने का अधिकार मिलने की वजह से केरल डूबने लगा।

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चमत्कारी बाबा ने रेलवे को बीमा की मुफ़्तख़ोरी से मुक्ति दिलायी!

नरेन्द्र मोदी से मशविरे के बाद रेल मंत्री पीयूष गोयल ने तय कर दिया है कि 1 सितम्बर 2018 से रेलवे की वेबसाइट से टिकट लेने वालों को मुफ़्त बीमा देने की सुख-सुविधा बन्द कर दी जाएगी। रेलवे चाहती है कि यदि आपको बीमा चाहिए तो इसका फ़ैसला ख़ुद लीजिए और उसके लिए अपेक्षित प्रीमियम भी ख़ुद भरिये। रेलवे के भरोसे रहने की ज़रूरत नहीं है। इसका मतलब ये हुआ कि जिस डिज़ीटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए रेलवे ने मुफ़्त बीमा का प्रोत्साहन या लॉलीपॉप दिया था, उसकी आठ महीने बाद ही कोई ज़रूरत नहीं रही। इसका ये अर्थ भी है कि या तो डिज़ीटल पेमेंट योजना ने अपने अपेक्षित लक्ष्य को हासिल कर लिया है, या फिर वो बुरी तरह से नाकाम रही है।

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डॉनल्ड ट्रम्प की ये ख़बर आपको नरेन्द्र मोदी को लेकर बेचैन कर देगी!

ट्रम्प ने अमेरिका में वैसे ही रोज़गार के अवसर विकसित करवाये हैं, जैसे भारत में नरेन्द्र मोदी ने ‘स्वच्छ भारत’ अभियान चलाया है! अब विकास पुरुष मोदी को ये भला कौन बताये कि बेचारा ‘स्वच्छ भारत’ ही पिछले जन्म में यानी मनमोहन सिंह के ज़माने में ‘निर्मल भारत’ कहलाता था। इसीलिए प्रधानमंत्री ने ये कहकर न्यूटन के गति के नियमों में चौथा नियम जोड़ दिया कि “यदि 70 साल पहले स्वच्छ भारत शुरू किया जाता तो भारत रोग मुक्त हो गया होता!” ये कोई मामूली खोज़ नहीं है! क्योंकि अमेरिका, इंग्लैंड जैसे दुनिया के तमाम विकसित देशों में दशकों से भारत के मुक़ाबले ज़बरदस्त साफ़-सफ़ाई का आलम बेहतरीन है। फिर भी वो कभी रोग मुक्त नहीं हो पाये!

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